Wednesday, July 11, 2018

मान. श्री हरीशभाइ रावल के ७५ वे जन्मदिन पर संघमंथन

      

     राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पुराने प्रचारको में से एक , गुजरात के श्री हरीशभाइ रावल जिसने संघ मे कंइ साल विभाग प्रचारक और बादमे विद्या भारती में कई सालों तक संगठन मंत्री का कार्य निभाया उनका आज 75वाँ जन्मदिन था । 
नडियाद के पास वसो गाँव स्थित विद्या भारती संस्थान से संलग्न श्री वसुंधरा संस्कार विद्याधाम समिति के द्वारा आयोजित इस दिन यज्ञ और माननीय श्री हरिशभाइ के अभिनंदन के लिए सभी कार्यकर्ता परिवार सहित एकत्रित हुए थे । इस कार्यक्रम में संघ के सह सरकार्यवाह माननीय डो मनमोहनजी वैद्य ने कहा:
      संघ के प्रचारक वो समाज के लीए जीवन की प्राण समान है ,जैसे अपने शरीर में आँख ,कान ,नाक ऐसी इंद्रियां अच्छे काम करती है और उनके बदले में कुछ अपेक्षा रखती है ।लेकिन प्राण शरीर को निभाये रखने के लिए कुछ भी अपेक्षा नहीं रखते हैं । अन्य इंद्रियां आराम भी माँगती है लेकिन प्राण कभी आराम नही करता है। 
यही बात दत्तोपंत ठेंगड़ी प्रचारक को मीलने की वजह बताते (अन्य व्यक्ति ओर से न मिलते हुए )उनको मिलने की बात कहते हुए पंडित सातवलेकरजी ने कही थी।ऐसे प्रचारक शब्द भी संघ स्थापना के कंइ वर्ष बाद आया । 
       मा. हरीशभाइ ऐसे व्यक्तियों में से एक है । जो निवृत्त होने के बाद भी सक्रिय हैं ।निवृति में सक्रियता यही ऐसे कार्यकर्ताओं की देन है।
       हरीशभाइ साहसिक , आनंदी और अपनी ख़ुशी में रहने वाले कार्यकर्ता है । विद्या भारती में कई अन्य कार्यकर्ताओं का निर्माण करने में उनका यह सह भाग रहा । कंइ पूर्णकालीन कार्यकर्ता निकालने में और महिलाओं को इसके लिए प्रेरित करने में वो बोहोत यशस्वी  रहे ।सब लोगों ने उनको दादा के नाम से पहचान बनायी है।
           दायित्व से मुक्त होने के बाद भी वह स्वयंसेवकों के परिवार में रुकना और परिवारों की बात सुनना और उसमें स्वयंसेवकत्व बना रहे यह उनका कार्य रहा है । सबको मिलना बहुत ज़रूरी है । बिना काम मिलना और मिलते रहना ही समय की माँग है ।अब तो अनौपचारिकता के लिए भी औपचारिक समय निकालना पड़ता है । हरीश दादा का यह कार्य बोहोत परिणाम दाई है। 
        अपने जीवन को सफल नहीं बनाना है किन्तु सार्थक बनाना यही नंदलाल बोस की अमृतभाइ वेगड ( शांतिवन मे चित्र शिक्षा के बाद) को दी हुइ आशीष संघ के कई कार्यकर्ताओं को लागू होती है । अपने निजी जीवन व्यवसाय और पूजापाठ में सी भी संघ के लिए समय निकालना यह अनेक कार्यकर्ताओं के जीवनमे रह है।  
     कई स्वयं सेवकों को अपने विचार को साथ देने वाला कोइ साथी चाहिए , ऐसे समय में हरीश भाई जैसे प्रचारक साथ खड़े रहते हैं यही सबके लिए सुविधा रहती है । परिवार में महिलाओं को कई बार अपनी बात या कुछ फरियाद बतानी है , उनके लिए ऐसे प्रचारक वडील की भूमिका अदा करते हैं।
       70 की आयु के बाद दायित्व से मुक्त होना है लेकिन कार्य करते रहना यह संघ के प्रचारक के लिए नया नही लेकिन अन्य के लीए प्रेरणा युक्त है। 
      आज के समय में कई लोगों को कुछ कहना है लेकिन सुनने वाला नहीं मिलता क्योंकि सुनने वाले के लिए भी अपने पास समय होना चाहिए ।संघ के कार्यकर्ता ऐसी व्यक्ति हैं जिनके पास ऐसी अपेक्षा है कि वो दूसरों की सुने और सुनने के लिए समय निकालें ।         इतना ही नहीं आत्मीयता जिसकी बात बहुत जरुरी है , लेकिन अनुभव में कम आती है। संघ बौद्धिकों में नहीं हैं संघ आचरण में है यही बताने वाले ऐसे कार्यकर्ता है जो हमारे जीवन की राह बनते हैं। 
      संघ के प्रचारक के जन्मदिन पर कुछ कार्यक्रम व कार्यकर्ताओं को मिलने का , एक दूसरे से बातें करने का और बहुत से अच्छे कार्यकर्ताओं से जीवन में से प्रेरणा लेने के लिए यह किया जाता है ।इसमें व्यक्तिगत विषय कम रहते हैं , संघ के विषय ज़्यादा रहते हैं । समाज जीवन के लिए हम क्या करे यह निष्कर्ष रहता है। 
      मा. हरीशभाइ रावल की दीर्घायु के लिए और स्वस्थ रहे और हम सब का मार्गदर्शन करते रहे इसी भगवान से प्रार्थना और शुभकामना । 







Friday, December 8, 2017

नरसीकाका( चंद्राला) ने श्रद्धांजली


माननीय नरसीकाका अब नहीं रहे । गांधीनगर के पास  चंद्राला नाम के गाँव के निवासी और एक कर्मवीर किसान थे । नरसीकाका एक प्रगतिशील किसान थे । शरु में भारतीय किसान संघ से साथ जुड़े थे ।संगठन का कार्य करते करते वो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के साथ से जुड़े । कई सालों तक गांधीनगर विभाग संघचालक और बाद में अपने अंतिम दिन तक गांधीनगर जिला के संघचालक रहे थे ।

        शिक्षण के प्रति उनका लगाव था । चंदराला शिक्षण संकुल के वो एक बहुत बड़े अच्छे कार्यकर्ता थे। खेती में अनेक नए प्रयोग करते थे । नदी किनारे की बंजर भूमि को कैसे अच्छी बनाना और इज़रायल technique से कम पानी में अच्छे निपज लेना यही उनकी एक बड़ी अच्छी वाली खेती की करामत थी। आलू उनके खेतों में से निकलते हुए लेने के लिए वेफर की कंपनियां तैयार रहती थी । ख़ुद किसान थे और अपने सब परिवार के लोगों को भी खेती के काम में जुड़े थे। वैज्ञानिक खेती की कई प्रयोग उसने कीए। परिवार के लोगने इज़राइल जाके कई नई पद्धतियाँ सीखी थी खेत में कैसे वैज्ञानिक पद्धति से खेती हो उनका आगरह रहता था। सरकार की ओर से खेत के विषय में अनेक सम्मान भी प्राप्त कर चुके थे । 

      अपने समाज के लिए भी कुछ करना ऐसा उनका हर हमेशा भाव बना रहता था ।समूह विवाह के लिए ख़ुद कार्यकर्ता बनके काम करते थे । वैसे वो बोलने में बोहोत शपषट थे। सच्ची लेकिन कड़वी बात बताने में कभी वो डिगमिगाते नहीं थे । वो बोहोत स्वाभिमानी और शौयँशील थे। चंद्राला में १९९९ में गुजरात प्रांत का संघ शिक्षा वर्ग हुआ तब उनके साथ पच्चीस दिन वर्ग में रहने का मौक़ा मुझे मिला था। वगँ के शिक्षार्थियों को हर तरह की सब्ज़ी वर्गों में वो खिलाते थे , इतना ही नहीं जब जब मिठाई की बारी आती तो आग्रह से सबके सामने बैठकर खिलाते थे । ऐसे काका अब नहीं रहे , लेकिन अब उनके विचार और कृति हमारे सामने सदाएं प्रेरणादायक रहेगी , औम शांतिे